मुझे मेरी दुनिया ही हसीन है
चाहे मै अकेला ही क्यों ना हूँ !
ना कोई रंजीश है ना कोई शिकवा
मश्गुल हूँ मै अपने ही ग़म में !
ना किसी से लेना है
ना किसी को कुछ देना है ,
हर पल हर लम्हा
खुद के लिये ही जिना है !
कोई कहे खुदगर्ज मुझे
क्या फरक पड़ता है ?
औरों के लिये जब सोचता था
बड़ा दयावान हुवा करता था ,
जब सोचने लगा कुछ अपने लिये
तब हो गया खुदगर्ज सब के लिये !
अब मै हूँ और मेरी तन्हाई है
अक्सर हम बैठ कर बातें करते है
ऐसा होता तो कैसा होता ?
वैसा होता तो कैसा होता ?
कहीं दूर दूर नजर देखते है हम
कोई धुंदला सा साया नजर आता
पास आते आते वो भी गायब हो जाता !
अब मै हूँ और मेरी ही दुनिया है
मेरे अलावा अब मेरा कोई नही है !
संकलन : सुशिल म. कुवर
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