हे बिरसा !
क्या मैं मर गया हूँ ?
अब मुझे आदिवासीयों पर हो रहे अत्याचारों पर
गुस्सा क्यूँ नहीं आता?
अब मुझे अपने जल, जंगल और जमीन
की फिक्र क्यूँ नहीं होती ?
अब माँ-बहनों के साथ जबर्दस्ती और
बलात्कार पर मेरा खून क्यूँ नहीं खौलता?
अब अपने पुरखों और पेन ठानों
के उजड़ने पर मुझे दुख क्यूँ नहीं होता?
अब अपने सगे संबंधी और परिवारों के
पिटने पर दर्द क्यूँ नहीं होता?
अब अपने घर द्वार और ज़मीनों से
विस्थापित होने पर छटपटाहट क्यूँ नहीं होती ?
अब मुझे अपनी भाषा, अस्मिता, संस्कृति को
खत्म करने वालों पर गुस्सा क्यूँ नहीं आता ?
अब मैं न्याय, समता, बंधुत्त्व और स्वतंत्रता
के लिए आवाज क्यूँ नहीं उठाता?
शायद अब मैं मुर्दा हो गया हूँ !
लगता है मैं मर गया हूँ
शायद मैं मर गया हूँ
मैं मर गया हूँ !!
संकलन : सुशिल म. कुवर