शनिवार, ३१ ऑगस्ट, २०२४

उलगुलान का मशाल

उलगुलान का मशाल तूफानी हवा के झोंके से बुझ गया क्या?
    बिरसा का आह्वान कंक्रीट के जंगल में समा गया क्या?
    पुरखों का सपना टूटकर शीशे की तरह चकनाचूर हो                                          गया क्या?

                गये कहां वंशज बिरसा के?
          चले थे जो लेकर मशाल उलगुलान की
            सो गये हैं क्या योद्धा उलगुलान के?
         अंग्रेजों को नाको चने चबवाये थे जिन्होंने 
               हैं कहां सिपाही उलगुलान के?
            खदेड़ा था जिन्होंने असूर दिशुम से
               जिंदल, मित्तल और टाटा को।

              शिकार की तलाश में फिर से 
      मंडराने लगे हैं वो खुले आसमान के नीचे
             बाज जैसे झपटने को हैं बेचैन
     दबोच लेना चाहते एक झटके में शिकार को
           निगल जाना चाहते प्रकृतिक संपदा
            भयावह अनाकोंडा की तरह।

             क्या है हमारा? कौन है हमारा?
                सबकुछ बड़ा ही धूमिल है
                  पहरेदार भी दगा दे गये
                  पूर्वजों का घेरा तोड़कर 
                  पुटूस को भी नहीं छोड़ा
                    जंगली झाड़ी बताकर
                लूट रहे दिखाकर सब्जबाग
                         समृद्ध होने का
                     शिकारियों की तरह। 

                 अब तो जागो बिरसा के वंशज
                 आ रही सुनामी पार से सात समुद्र
                           तोड़ा गया है बांध 
                        लुढ़काया गया है पत्थर
                     झाड़ियां भी सब कट चुकी हैं
                          हो चुका है सूर्य अस्त
                      चीर दो घने बादलों को अब
                     उठा लोे मशाल उलगुलान का
                     करेगा वही बेड़ा पार तुम्हारा ..


सुशिल म. कुवर 


गुरुवार, २८ एप्रिल, २०२२

सफर जिंदगी..

''राहें छोटी हों
या लंबी
क्या फ़र्क़ पड़ता है
कि किस मुल्क की
किस सड़क पर
तुम अपनी राह खोते हो

हज़ारों मुल्क
हज़ारों ज़ुबानें
क्या फ़र्क़ पड़ता है
कि किस मुल्क में
किस भाषा में
साधते हो तुम चुप्पी?''

- सुशिल म. कुवर

शनिवार, २३ एप्रिल, २०२२

वह तुम हो..

मैं जिस प्रिती को 
महसूस कर नहीं पाया 
--बस इतराते रहा 

वह तुम हो..

मैं जिस प्रेम में 
पग नहीं पाया 
उसे लगातार 
पगाती 

वह तुम हो..

मैं जिस धुन को 
संभाल नहीं पाया 
उसे बार-बार 
सहेजती 

वह तुम हो..

मैं जिसमें डूबकर भी 
किनारा पा गया 

वह तुम हो..

मैं जिस युगल-धुन को 
बेसुरा गाता रहा 
जिसने राग की 
लाज बचाई 

वह तुम हो..

मैंने जिसे देखकर भी 
अनदेखा किया 
ऐसी सुंदर 
चहचहाती चिड़िया 

वह तुम हो..

मेले में 
कसकर हाथ पकड़ 
बार-बार 
अकेले होने से बचाया 

वह तुम हो..

मैं सातवें आसमान में 
उड़ सकूं 
इसलिए अपने पंख भी 
मुझे सौंप दिए 

वह तुम हो..

मेरे मुरझाये 
स्वप्न-वर्षों में 
एक अकेला खिला 
ब्रम्ह-कमल 
वह तुम हो..

हां ! वह तुम ही हो !

-- सुशिल म. कुवर

सोमवार, ३१ जानेवारी, २०२२

हे बिरसा !

हे बिरसा !

क्या मैं मर गया हूँ ?

अब मुझे आदिवासीयों पर हो रहे अत्याचारों पर 

गुस्सा क्यूँ नहीं आता?

अब मुझे अपने जल, जंगल और जमीन 

की फिक्र क्यूँ नहीं होती ?

अब माँ-बहनों के साथ जबर्दस्ती और 

बलात्कार पर मेरा खून क्यूँ नहीं खौलता?

अब अपने पुरखों और पेन ठानों 

के उजड़ने पर मुझे दुख क्यूँ नहीं होता?

अब अपने सगे संबंधी और परिवारों के 

पिटने पर दर्द क्यूँ नहीं होता?

अब अपने घर द्वार और ज़मीनों से 

विस्थापित होने पर छटपटाहट क्यूँ नहीं होती ?

अब मुझे अपनी भाषा, अस्मिता, संस्कृति को 

खत्म करने वालों पर गुस्सा क्यूँ नहीं आता ?

अब मैं न्याय, समता, बंधुत्त्व और स्वतंत्रता

के लिए आवाज क्यूँ नहीं उठाता?

शायद अब मैं मुर्दा हो गया हूँ !

लगता है मैं मर गया हूँ

शायद मैं मर गया हूँ

मैं मर गया हूँ !!

संकलन : सुशिल म. कुवर

मनुष्य ही थे...

झुंड-झुंड में चलानेवाले
बारीक पतले देह के
तेल लगे काले रंग के
अधनंगे, खुले बदन, तोतले से
झुर्रियों वाले खामोश चेहरे के
पेट अंदर गये हुए
खोपड़ी में सिर अटके हुए
सिर पर उनके घगरी-मटके
शरीर कंधों पर बाल-बच्चे
संघर्ष करते निकल पड़े, जीने के लिए
वे मनुष्य ही थे…

संकलन : सुशिल म. कुवर

मुझे मेरी दुनिया ही हसीन है!

मुझे मेरी दुनिया ही हसीन है 
चाहे मै अकेला ही क्यों ना हूँ ! 
ना कोई रंजीश है ना कोई शिकवा 
मश्गुल हूँ मै अपने ही ग़म में ! 
ना किसी से लेना है 
ना किसी को कुछ देना है , 
हर पल हर लम्हा 
खुद के लिये ही जिना है ! 
कोई कहे खुदगर्ज मुझे 
क्या फरक पड़ता है ? 
औरों के लिये जब सोचता था 
बड़ा दयावान हुवा करता था , 
जब सोचने लगा कुछ अपने लिये 
तब हो गया खुदगर्ज सब के लिये ! 
अब मै हूँ और मेरी तन्हाई है 
अक्सर हम बैठ कर बातें करते है 
ऐसा होता तो कैसा होता ? 
वैसा होता तो कैसा होता ? 
कहीं दूर दूर नजर देखते है हम 
कोई धुंदला सा साया नजर आता 
पास आते आते वो भी गायब हो जाता ! 
अब मै हूँ और मेरी ही दुनिया है 
मेरे अलावा अब मेरा कोई नही है !
 
संकलन : सुशिल म. कुवर


तू फक्त प्रेमासाठी प्रेम कर

वेडी आशा बाळगत
स्वप्न सोनेरी पाहत
तू फक्त प्रेम कर
प्रेमासाठी प्रेम कर
 
जन्मभर भटकू नकोस
वारा खुळा होवू नकोस
जीव जडव असा कुणावर 
सारे काही लाव पणावर

फक्त तिचा विचार कर
तिच्याशीच मैत्री कर
उगा लांबवर राहू नको
मनात मांडे खाऊ नको 
शब्दामधून शब्दावाचून
तिला येवू देत प्रेम कळून

प्रेम नको फक्त चेहऱ्यावर 
आत्म्यावरही प्रेम कर
आत्मा वगैरे ना कळले तर
प्रेम कर तिच्या मनावर
मन म्हणजे गुणावगुण
स्वीकार सारा मनापासून
   
अन कदाचित कळल्यावाचून
प्रेम बीज जर गेले मरून
दुख जपून मनात ठेवून
जा शोध जा नवी जमीन
पुन्हा पेर पाणी घाल
धीर धर जावू दे काळ
अलगद प्रेम येता रुजून
जीवापाड ठेव जपून

तिथे घाई चालत नाही
अरे तो बाजार नाही
सुरामध्ये भिजल्यावाचून 
गाणे कसे येईल कळून
जेव्हा तुला प्रेम मिळेल
जन्म खराखुरा कळेल

संकलन : सुशिल म. कुवर