बुधवार, २० ऑक्टोबर, २०२१
भील हूँ पर ढील नहीं, कुछ लिखूँ पर शब्द नहीं !
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रविवार, २५ एप्रिल, २०२१
देश - दशा
छुपने और छुपाने का रास्ता जब छोडेंगे।
देश की खुशहाली से दिल का रिस्ता जोडेंगे।
भ्रष्टाचार ने पूरे देश में जाल बिछाया है।
महंगाई के मारे लोग सडकों पर आए है।
भूख गरीबी के तूफां से रूख मोडेंगे।
झुकने और झुकाने का रास्ता जब हम छोडेंगे।
छोटे- छोटे दप्तर भी अब पैसा लेते है।
थाने और चोरों से मिलकर कितना दुख देते है।
पत्थर दिल अफसर से कब तक सिर फोडेंगे।
देश की खुशहाली से दिल का रिस्ता जोडेंगे।
झुठे वायदों का गुस्सा सिर चढ के बोला है।
इन्कलाब ने दिल का वो दरवाजा खोला है।
जिसके हवनकुंड में अपना लहू निचीडोंगे।
देश की खुशहाली से दिल का रिस्ता जोडेंगे।
आम आदमी की ताकत ने जो खेल दिखाया है।
सरकारी तानाशाहीं को ये समझाया है।
तुम लोगों का बोझ उठाए हम वह जिद छोडेंगे।
देश की खुशहाली से दिल का रिस्ता जोडेंगे।
झुकने और झुकाने का रास्ता जब हम छोडेंगे।
धर्मपूर्वी सुशिल म. कुवर
मो. ७५०७०८४१५२