बुधवार, २० ऑक्टोबर, २०२१

भील हूँ पर ढील नहीं, कुछ लिखूँ पर शब्द नहीं !

भील हूँ पर ढील नहीं, कुछ लिखूँ पर शब्द नहीं !
तीर-कमान हैं पर अँगूठा नहीं, कुछ दूँ पर धन नहीं !
गुरू दक्षिणा हैं पर द्रोणाचार्य नहीं, ढूँढे पर जगह नहीं !
सीधे सादा हूँ पर चालाक नहीं, मिट्टी हैं पर सोना नहीं !

जमीन हैं पर मेरी नहीं,
बीज हैं पर खाद नही !
आदिवासी हूँ पर गुलाम नहीं,
मूलनिवासी हूँ पर वनवासी नहीं !

शिक्षा हैं पर शिक्षक नहीं, अस्पताल हैं पर डाक्टर नहीं !
औहदा हैं पर औकात नहीं,
बेतन हूँ पर वेतन नहीं !
बच्चे हैं पर होस्टल नहीं, छात्रावास पर व्यवस्था नहीं ! हूनर हैं पर हासिल नहीं, नेता हैं पर मेरा नहीं !

गीता हैं पर संविधान नहीं,
नियम हैं पर पालन नहीं !
आरक्षण हैं पर मिला नहीं,
अनेक हैं पर एक नहीं,

ताकत हैं पर लगाई नहीं !
मौत हैं पर नसबन्दी नहीं,
कत्लेआम हैं मगर मोमबत्ती नहीं !
जाति हैं मगर समाज नहीं,

धर्म हैं पर मिलाया नहीं !
गम हैं पर आँसू नहीं, पराये हैं पर अपने नहीं !
पलायन हैं पर ठहराव नहीं, मेहनत हैं पर मेहनाता नहीं !
वोट हैं पर खोट नहीं, मै नहीं मगर और ही सही !

शब्द हैं पर जीभ नहीं, मानव हूँ पर औकात नहीं !
प्रेम हैं पर मुझ पर नहीं, जानवर हैं पर मै नहीं !
भील हूँ पर ढील नहीं कुछ लिखूँ पर शब्द नहीं !

संकलन:  सुशिल म. कुवर ✍️

फोटो: प्रतिकात्मक आवर्जून शेअर करा



मोबाईल

खरं खरं सांगतो राव ,
उगीच न्हायी ठेवत नाव....
या मोबाईलनं बिघडवलं
आता सारं माझं गांव....

पिंपळाचा मोठा पार होता,
वारा थंडगार होता.....
गप्पा ,निरोप,खुशाली,
कहाण्यांचा बाजार होता....

काय चाललंय ? कसं चाललंय?
एकमेकांत संवाद होता....
कबड्डी होती, कुस्ती होती,
आट्या - पाट्या, लपाछपी,
सुर-पारंब्यावरचे झोके होते,
ओढ्याच्या डोहात पोहणे होतं.
आंब्याच्या झाडावरच बसुन,
कच्चे-पिकलेले आंबे खायची मजा होती...

विटी-दांडु, खेळाच मैदान होतं,
इतर अनेक मैदानी खेळ होते...
उनाडक्या होत्या, मस्ती होती,
आप-आपसात मेळ होता...

चिंचा होत्या,बोरं होती,
आंबे होते, ऊस होता...
गोठाभर ढोरं होती...
ढोरांबरोबर पोर होती....

जिवाला जीव देणारे,
दिलदार मित्र होते......
नवरात्र ढाक वादन होतं, डोंगऱ्यादेव होतं,
जात्यावरचं गाणं होतं.…
शाळेतल्या कवितेत ,
आनंदाचं उधाण होतं...
पण..............

जसं गावात हा कोठुन,
मोबाईल आला, नेट आलं....
चँनलच कनेक्शन,
घरा घरात थेट आलं...

गजबजलेलं गाव माझ,
आता निर्जन बेट झाल....
सकाळ संध्याकाळ सारी माणस,
टीव्हीलाच चिटकुन राहीली..

रस्तावर वर्दळ करणारी माणसे,
टीव्ही पुढंच सेट झालीत.....
मैदानावरील मुल सारी,
घरामागच्या अंधारात...

मोबाईल मध्येच, गुंतली सारी......

सुने सुने झाले पिंपळाचे पार,
मुके झाले चिरीचे ओटे....
दिवस-रात्र मोबाईल वर,
नुसती फिरवत राहतात बोटे.....

खरं खरं सांगतो राव.....
या मोबाईलनच बिघडवल माझ सार गाव !

संकलन: सुशिल म. कुवर

फोटो : प्रतिकात्मक आवर्जून शेअर करा

रविवार, २५ एप्रिल, २०२१

देश - दशा

छुपने और छुपाने का रास्ता जब छोडेंगे।

देश की खुशहाली से दिल का रिस्ता जोडेंगे।
भ्रष्टाचार ने पूरे देश में जाल बिछाया है।
महंगाई के मारे लोग सडकों पर आए है।
भूख गरीबी के तूफां से रूख मोडेंगे।
झुकने और झुकाने का रास्ता जब हम छोडेंगे।
छोटे- छोटे दप्तर भी अब पैसा लेते है।
थाने और चोरों से मिलकर कितना दुख देते है।
पत्थर दिल अफसर से कब तक सिर फोडेंगे।
देश की खुशहाली से दिल का रिस्ता जोडेंगे।
झुठे वायदों का गुस्सा सिर चढ के बोला है।
इन्कलाब ने दिल का वो दरवाजा खोला है।
जिसके हवनकुंड में अपना लहू निचीडोंगे।
देश की खुशहाली से दिल का रिस्ता जोडेंगे।
आम आदमी की ताकत ने जो खेल दिखाया है।
सरकारी तानाशाहीं को ये समझाया है।
तुम लोगों का बोझ उठाए हम वह जिद छोडेंगे।
देश की खुशहाली से दिल का रिस्ता जोडेंगे।
झुकने और झुकाने का रास्ता जब हम छोडेंगे।

धर्मपूर्वी सुशिल म. कुवर

मो. ७५०७०८४१५२