हमने कलम पकड़ ली है
सोच लेना तुमहमारे कलम के प्रहार से
बच सकोगे क्या तुम?
हमारे शब्द बाण को
झेल पाओगे क्या तुम?
हमारे तर्क और सवालों से
निपट सकोगे क्या तुम?
हमने कलम पकड़ ली है
सोच लेना तुम
सनसनाती तीर के खौफ से
काटवाया था अंगूठा एकलब्य का
तुमने छलकपट से
फिर भी छिन सके थे क्या?
काबीलियत उसकी तुम
आरक्षण को बनाकर हाथियार
तुम नाकारते रहे काबीलियत हमारी
आरक्षण भी नहीं रहा
अब सहारा तुम्हारा
बचने का कोई नया तरीका
ढ़ूढ़ लो फिर से
हमने कलम पकड़ ली है
सोच लेना तुम
असूर, शैतान और राक्षस कहा है हमें
तुमने अपने धर्म ग्रांथों में
जंगली, आदिम और असभ्य बताया है हमें
तुमने अपने विकासवादी सिद्धांतों में
पिछड़, कमजोर और अनपढ़ लिखा है हमारे बारे
तुमने अपने सरकारी दस्तावेजों में
नक्सली, देशद्रोही और विकास विरोधी बताया है हमें
तुमने अपने कानून की किताबों में
खिलाया है चिंटी और पिलाया है शराब हमें
तुमने अपने कहानी और कविताओं में
नाकार दिया है बलिदान हमारा
तुमने अपने इतिहास में
अब बचा क्या है तुम्हारे पास?
लिखने को हमारे खिलाफ
हमने कलम पकड़ ली है
सोच लेना तुम
देश का इतिहास
अब लिखेंगे हम
ईमानदारी के साथ
लिखेंगे कहानी, कविता और वीर गाथा अपनी
और देंगे दुनियां को
तुम्हारे बेईमान होने का प्रमाण
हमने कलम पकड़ ली है
सोच लेना तुम
सुशिल म. कुवर
कोणत्याही टिप्पण्या नाहीत:
टिप्पणी पोस्ट करा