शनिवार, २३ एप्रिल, २०२२

वह तुम हो..

मैं जिस प्रिती को 
महसूस कर नहीं पाया 
--बस इतराते रहा 

वह तुम हो..

मैं जिस प्रेम में 
पग नहीं पाया 
उसे लगातार 
पगाती 

वह तुम हो..

मैं जिस धुन को 
संभाल नहीं पाया 
उसे बार-बार 
सहेजती 

वह तुम हो..

मैं जिसमें डूबकर भी 
किनारा पा गया 

वह तुम हो..

मैं जिस युगल-धुन को 
बेसुरा गाता रहा 
जिसने राग की 
लाज बचाई 

वह तुम हो..

मैंने जिसे देखकर भी 
अनदेखा किया 
ऐसी सुंदर 
चहचहाती चिड़िया 

वह तुम हो..

मेले में 
कसकर हाथ पकड़ 
बार-बार 
अकेले होने से बचाया 

वह तुम हो..

मैं सातवें आसमान में 
उड़ सकूं 
इसलिए अपने पंख भी 
मुझे सौंप दिए 

वह तुम हो..

मेरे मुरझाये 
स्वप्न-वर्षों में 
एक अकेला खिला 
ब्रम्ह-कमल 
वह तुम हो..

हां ! वह तुम ही हो !

-- सुशिल म. कुवर

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