आदिवासी कविता
गुरुवार, २८ एप्रिल, २०२२
सफर जिंदगी..
''राहें छोटी हों
या लंबी
क्या फ़र्क़ पड़ता है
कि किस मुल्क की
किस सड़क पर
तुम अपनी राह खोते हो
हज़ारों मुल्क
हज़ारों ज़ुबानें
क्या फ़र्क़ पड़ता है
कि किस मुल्क में
किस भाषा में
साधते हो तुम चुप्पी?''
- सुशिल म. कुवर
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